खजुराहो अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल जाने-माने अभिनेता राजा बुंदेला ने तीन साल पहले मध्य प्रदेश के खजुराहो में खजुराहो अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल (केआईएफएफ) यानी किफ की शुरुआत की थी।

पिछले दिनों आठ दिवसीय खजुराहो अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का आयोजन बुंदेलखंड की धरती पर धूमधाम से किया गया। इस आयोजन का बड़ा हासिल बुंदेलखंड की कला-संस्कृति को संजोने और प्रसारित करने का प्रयास दिखा।

इस बार इसका चौथा संस्करण 17 से 24 दिसंबर तक आयोजित किया गया। देश भर में फिल्म फेस्टिवल इधर बड़ी तादाद में होने लगे हैं, लेकिन किफ की विशेषता उसका देशज स्वरूप है। खुद आयोजकों के मुताबिक ‘दुनियाभर में हो रहे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में हमारा यह आयोजन इसलिए अलग है कि हम सिनेमा के माध्यम को किसान-मजदूरों, आम ग्रामीण महिलाओं सहित आखिरी पायदान पर खड़े मनुष्य के पास ले आए हैं। यह आयोजन केवल मनोरंजन का उत्सव नहीं, हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी है।’ राजा बुंदेला और उनकी पत्नी सुप्रसिद्ध अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी ने किफ में कुछ ऐसे प्रयोग किए हैं, जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलते। मसलन, टपरा टाकीज। टपरा टाकीज तंबू में बनाया गया अस्थायी सिनेमाघर है, जिसमें करीब दो सौ लोग बैठ सकते हैं। गांव-देहात के गरीब-गुरबा लोगों तक सिनेमा पहुंचाने के लिए किया गया यह एक अनूठा प्रयोग है। खजुराहो के मुख्य आयोजन स्थल पर इस बार ऐसे तीन टपरा टाकीज थे, साथ ही आसपास के गंज बमीठा, चंद्रनगर आदि जगहों पर भी इनके जरिए फिल्मों के समानांतर प्रदर्शन किए गए। समारोह में भाग लेने आईं राहुल रवैल और अनुपम खेर जैसी बड़ी हस्तियां इन प्रयोगों से काफी प्रभावित दिखीं। खजुराहो के मंदिरों को देखने के बाद राहुल रवैल ने इरादा जताया कि शायद मैं खजुराहो पर भविष्य में कोई फिल्म बनाऊं। उनके अलावा अभिनेता रजा मुराद, रोहिताश्व गौड़ और टेलीविजन सीरियलों की दुनिया का काफी बड़ा नाम अरविंद बब्बल भी फेस्टिवल में शिरकत करने आए।
नगर के बीचों-बीच मुख्य आयोजन स्थल पर हर रोज देर शाम होने वाले मुख्य कार्यक्रमों का स्वरूप भी किसी बनावटी गंभीरता के बजाय लोकरुचि के अनुरूप रखा गया था। एक ओर इसमें मध्य प्रदेश के ही रहने वाले प्रसिद्ध टीवी कलाकार एहसान कुरैशी के हास्य-व्यंग्य के तीर थे, तो दूसरी ओर संगीत-नृत्य और अन्य विधाओं की नवोदित स्थानीय प्रतिभाओं को भी भरपूर मौका दिया गया। प्रतिदिन दर्शकों की एक बड़ी तादाद इस फेस्टिवल की एक सफलता कही जा सकती है। फिल्म फेस्टिवल को अभिजात वर्ग के आयोजन की छवि से निकालकर बाहर लाने की कोशिश में इस बार की थीम महिला सशक्तीकरण और देश रक्षा में जुटे जवानों, किसानों और नौजवानों को बनाया गया था। किफ की शुरुआत से पहले 13 से 18 दिसंबर तक स्थानीय युवाओं के लिए फिल्म मेकिंग कार्यशाला का आयोजन भी किया गया जिसे फिल्म क्रिटिक मनोहर खुशलानी, सुष्मिता मुखर्जी, आरिफ शहडोली, उदयशंकर पाणि और अतिशय जैन ने संबोधित किया। इस बार के किफ में करीब 150 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फीचर और लघु फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। लेकिन उसकी सबसे खास बात है स्थानीय लोगों से उसका गहरा जुड़ाव। पिछली बार की ही तरह बड़े पैमाने पर स्थानीय लोगों ने इसमें शिरकत की, और उसमें बड़ी संख्या में युवाओं को मंच मुहैया कराया गया। यह आयोजन बुंदेलखंड के प्रति राजा बुंदेला की चिंताओं और लगाव का नतीजा है। अलग बुंदेलखंड की मांग को लेकर उन्होंने पिछले आठ सालों से एक व्रत ले रखा है और अपनी चिंता में तीन च-वस्तुओं, चावल, चपाती और चारपाई का पूर्णतया त्याग कर दिया है। उन्हें विश्वास है कि किफ भविष्य में बुंदेलखंड के नौजवानों के लिए रोजगार और रचनात्मकता के अवसर लेकर आएगा। अपनी लोकपरंपराओं के लिए जाना जाने वाले बुंदेलखंड का सिनेमा भोजपुरी की तरह ही अपने खास पहचान के साथ सामने आएगा। किफ की शुरुआत के बाद से कई फिल्में, अलेक्स हिंदुस्तानी, सुई धागा, स्त्री, सोन-चिरैया, लुक्का-छिप्पी, रावण, मन्दाकिनी बुंदेलखंड में शूट हो चुकी हैं। और इसे राजा बुंदेला इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत मानते हैं।

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