एक गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक इतिहास सहेजने वाली अयोध्या का दुर्भाग्य है कि उसे जिस राम जन्मभूमि के कारण चर्चित रहना था, वह विवाद के कारण सुर्खियों में रहती है। दुनिया के कोने-कोने में राम के भक्त हैं, जिनमें जितनी आस्था भगवान राम को लेकर है, उतनी ही उनकी जन्मस्थली अयोध्या के प्रति। इसके बावजूद अयोध्या में आने वाले श्रद्धालु जब रामलला के दर्शन को आते हैं, तो उनकी यही कामना होती है कि अगली बार वे टेंट के बजाए राम मन्दिर में अपने आराध्य का दर्शन करें। विवादित भूमि पर मन्दिर बनाम मस्जिद की लड़ाई इस सोच पर इतनी भारी पड़ी है कि अयोध्या समय-समय पर इसके कारण सुर्खियों में आती रहती है।

देश में पहले कभी इतने संगठित और योजनाबद्ध तरीके से राम मन्दिर निर्माण को लेकर ऐसा माहौल कभी नहीं बना। निश्चित ही इसका श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जाता है।

ढाई दशक बाद धर्मसभा इसकी वजह बनी। अपनी तरह का यह पहला मौका था, जब केन्द्र और उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार होते हुए ऐसा आयोजन हुआ और जिसका सूत्रधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं बना। संघ ने खुलकर कार्यक्रम की अगुवाई की और मन्दिर बनाने के लिए सरकार पर दबाव डाला। देखा जाए तो संघ पर पर्दे के पीछे से राजनीति करने का आरोप लगाने वालों को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने उस बयान से ही जवाब दे दिया, जिसमें उन्होंने साफतौर पर कहा कि राम मन्दिर का बनना गौरव की दृष्टि से आवश्यक है। मन्दिर बनने से देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनेगा। ऐसे में इसमें और देरी नहीं की जानी चाहिए। इसके बाद लाखों की भीड़ के बीच धर्मसभा में भी यही बात दोहरायी गई। 1992 के बाद यह अयोध्या में सबसे बड़ा जमावड़ा रहा।

दबाव की राजनीति करने पहुंचे उद्धव ठाकरे

धर्मनगरी में सियासी और धार्मिक उफान के बीच शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे भी अयोध्या पहुंचे और छत्रपति शिवाजी के जन्म स्थान शिवनेरी किले से मिट्टी अपने साथ लेकर गए। उद्धव इस मामले पर बीजेपी पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत काम कर रहे हैं। इसीलिए उनकी पार्टी ने ‘पहले मंदिर फिर सरकार’ का नारा भी दिया है। उद्धव भी अच्छी तरह जानते हैं कि मामला कोर्ट में है, इसलिए सियासी तौर पर कुछ नहीं किया जा सकता। लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव पर भी उनकी नजर है। इस वजह से बीजेपी पर दबाव बनाते हुए वह महाराष्ट्र में हिन्दुत्व की राजनीति को गर्माना चाहते हैं। उनकी कोशिश अन्य स्थानों पर भी इसका सियासी लाभ उठाने की है। इसके लिए वह मंदिर निर्माण को लेकर केन्द्र सरकार पर भी हमला बोल रहे हैं। दरअसल शिवसेना अयोध्या में राममन्दिर निर्माण मुद्दे के जरिये अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना चाहती है। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद शिवसेना की छवि कट्टर हिन्दुत्व वाली पार्टी की बनी। इसका उसे सियासी लाभ भी मिला, लेकिन बाल ठाकरे के दिवंगत होने, राज ठाकरे के अलग सियासी राह चुनने सहित अन्य कारणों से धीरे-धीरे शिवसेना का ये तिलिस्म टूट रहा है। बीजेपी उसके मुकाबले मजबूत हो रही है। इस वजह से उद्धव भी इस सियासत में कूद पड़े हैं। उनके सामने खुद का राजनीतिक वजूद बनाये रखने की भी चुनौती है।

इसके लिए पहले से ही सभी अनुषांगिक संगठनों को जिम्मेदारी दी गई। हर स्तर पर उसकी समीक्षा की गई। जगह-जगह मोटरसाइकिल रैलियां निकालकर लोगों को अयोध्या पहुंचने का आह्वान किया गया। वहीं स्थानीय स्तर पर गली-गली प्रभात फेरियों में कीर्तन-भजन गाकर आम जनमानस को जागरूक किया गया। संघ ने स्पष्ट किया कि मन्दिर निर्माण को लेकर वह अपने संकल्प से किसी भी सूरत में पीछे हटने को तैयार नहीं है। इन सबके बीच बात यह रही हक सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने स्वयं अयोध्या में डेरा डाला और हर तैयारी को बारीकी से परखा। उनके अलावा सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल और दत्तात्रेय होसबोले की भी मौजूदगी धर्मसभा को सफल बनाने में जुटी रही।

कुम्भ के दौरान प्रयागराज में तीन दिवसीय धर्म संसद का आयोजन किया जाएगा। यह धर्म संसद 30 जनवरी से लेकर 1 फरवरी, 2019 तक चलेगी।

इस पूरी कवायद से साफ सन्देश दिया गया कि राम मन्दिर मुद्दे को लेकर संघ कितना गम्भीर है।

लगातार होंगे आयोजन

संघ अब पूरी तरह से राम मन्दिर मुद्दे को अंजाम तक पहुंचाने का मन बना चुका है। 25 नवम्बर को अयोध्या सहित बेंगलुरु और नागपुर में धर्मसभा के आयोजन के बाद वह 9 दिसम्बर को दिल्ली में विराट धर्मसभा की तैयारियों में जुट गया है। देश में पहली बार इतने संगठित और योजनाबद्ध तरीके से राम मन्दिर निर्माण को लेकर माहौल बनाया जा रहा है। विहिप के केन्द्रीय मंत्री राजेन्द्र सिंह पंकज के मुताबिक दिल्ली के बाद फिर देश भर में एक सौ बड़ी सभाओं का आयोजन किया जाएगा। फिर देश भर के पांच सौ जनपदों में भी मंदिर निर्माण के समर्थन में रैलियां की जाएंगी। इसके बाद कुम्भ के दौरान प्रयागराज में तीन दिवसीय धर्म संसद का आयोजन किया जाएगा। यह धर्म संसद 30 जनवरी से लेकर एक फरवरी 2019 तक चलेगी। इस धर्म संसद में देश भर के पांच हजार से अधिक दिग्गज धमार्चार्य सम्मिलित होंगे और भावी योजना की घोषणा करेंगे। सीधे तौर पर कहा जाए तो संघ ने राम मन्दिर निर्माण के मुद्दे को राष्ट्रीय परिदृश्य पर लाने के लिए ब्लूप्रिंट तैयार किया है। इसीलिए वह संतों का मंत्र और विहिप का तंत्र के स्लोगन के जरिए भव्य राम मन्दिर निर्माण की बात कह रहा है।

धर्मसभा का उद्देश्य

विश्व हिन्दू परिषद की ओर से भी स्पष्ट किया गया कि मन्दिर निर्माण पर देरी जनआंकाक्षाओं का अपमान है। उपाध्यक्ष चंपत राय के मुताबिक धर्मसभा का उद्देश्य राम मन्दिर मार्ग में आ रही बाधाओं का दूर करना था। धर्मसभा के जरिए नई पीढ़ी को इस मुद्दे पर जानकारी देने की भी पहल की गई, जिन्हें इसके बारे में पता नहीं था। साजिश के तहत इस मामले को छल कपट से कोर्ट में लम्बा खींचा जा रहा है। वरना कोर्ट पहले ही इस पर अपना फैसला सुना चुका होता। अब हिन्दू समाज इस मुद्दे को लेकर और प्रतीक्षा नहीं कर सकता। अगर धर्मसभा सहित राम मन्दिर निर्माण से जुड़े संघ से सम्बन्धित अन्य आयोजन की जरूरत पर नजर डालें, तो मन्दिर समर्थकों का स्पष्ट मानना है कि इससे बेहतर माहौल फिर शायद ही बने। इसलिए इसे राष्ट्रव्यापी बनाने के लिए जागरुकता फैलायी जा रही है। विहिप पदाधिकारियों के मुताबिक ऐसे आयोजन केन्द्र सरकार को बल प्रदान करेंगे। लोकतंत्र में जनभावनाओं का आदर किया जाना चाहिए। सरकारें जनभावना का प्रतिनिधित्व करती हैं, ऐसे में केन्द्र सरकार को पहल करनी चाहिए। देश में एक बड़ा वर्ग है जो कि मन्दिर निर्माण के मार्ग में लगातार बाधा खड़ी कर रहा है। यह वर्ग कोर्ट से लेकर सरकार तक सक्रिय है। इस वर्ग को ऐसे आयोजनों के जरिए शक्ति का दर्शन कराया जाएगा।

नजर आया चुनावी शिगूफा

इस पूरे माहौल के बीच विपक्ष इसे बीजेपी का चुनावी शिगूफा बता रहा है। समाजवादी, बीएसपी और कांग्रेस की ओर से चुनाव आते ही बीजेपी पर एक बार फिर मन्दिर मुद्दा उछाले जाने का आरोप लगाया गया है। मायावती शुरुआत से ही संघ पर बांटने की राजनीति करने का आरोप लगाती रही हैं। अखिलेश तो देश को आरएसएस से बचाना होगा, जैसा बयान दे चुके हैं। वहीं उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खां के मुताबिक मामला न तो मन्दिर का है और न ही रामचंद्र जी का, यह मामला चुनाव का है। जब तक मामला कोर्ट में है, कानून नहीं बन सकता। हालांकि बीजेपी पर राम के नाम पर सियासत का आरोप लगाने वाले इन दलों ने स्वयं अल्पसंख्यकों को वोट बैंक के लिए रिझाने से परहेज नहीं किया। वहीं हिन्दुओं की नाराजगी को देखते हुए सीधे तौर पर राम मन्दिर के विरोध में बोलने से परहेज कर रहे हैं।

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